गुरुवार, 3 नवंबर 2016

गजल --

गजल - मुस्कुराने के लिये
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हम उलझ गये खुद को अब सुलझाने के लिये।
लिखते है गजल ये तुझे बतलाने ले लिये॥
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ये समझना नहीं कि अब वो चाहत नही रहीं,
परेशाँ करते नहीं तुझे मुस्कुराने के लिये॥
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लोग हो जाते फिदा हैं किसी अंजान हंसी पे,
पर हमें तुझसे प्यार नहीं तुझे दिखलाने के लिये।
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था पता हमें हम किसी के कौन थे मगर,
फिर भी किये थे इश्क खुद को तडपाने के लिये।
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ये दुनियां है मेरे दोस्त यहाँ सबको शिकायत हैं,
जीते हैं लोग किसी दिन मरजाने के लिये।
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होती है कहाँ खुसबू बनावटी गुलाब में,
रखते हैं लोग उसे सिर्फ दिखलाने के लिये।
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इश्क ए चराग दिल में जलाया इस आस पर,
नफरतों की हवाओं से बुझजाने के लिये॥
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होता है सच का प्यार कहाँ धोखे बाजी मे,
फिर भी करते हैं सौदा लोग ये पछताने के लिये।
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एक शेर उन लोगो की मोहब्बत  के हवाले से हो गयस है, जो ऐसे बोलते हैं... मेला बाबू खाना खा लिया)
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ये बच्चों जैसी हरकतें करते क्यूं इश्क में,
ये सच का प्यार है या सिर्फ है हकलाने के लिये।
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समझा है कहाँ कब खुदा तारे के दर्द को,
करता है जुदा चांद से बिछुडाने के लिये॥
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सुन अश्क सोचता है कौन किसके दर्द पे,
जुदा करते गुल ए डाल घर महकाने के लिये॥
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Copyright © akgautam_2016
अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

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