*गजल*
आज सब मौसमे गुल मे ढलने लगे।
हम सुनें हैं देश के दिन बदलने लगे।
क्यूं पडे आदमी यूं ही बीमार न,
वक्त बे-वक्त जो मौसम बदलने लगे।
इल्म काला हो गोरा पर मेहनत का हो,
आहटें सुन नही नब्ज रुकने लगे।
लोग सदमे मे आ गये खबर सुनते ही
लौह भी स्वर्ण मे न बदलने लगे।
लडकियों मे खुशी की लहर छा गयी,
पिंक नोटों के चर्चे जो चलने लगे।
काला धन गोरे मे जब बदल जा चुका,
वो वापसी धन का ऐलान करने लगे।
नीति और राजनीति पे बोले ही थे,
उनके चमचों के तेवर बदलने लगे।
चाय खाँसी कभी साथ होगी नहीं,
एक को लेते ही एक उगलने लगे।
अश्क तुझको दिनों से शिकायत नहीं,
तेरे गुलशन के गुल तो महकने लगे।
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--- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
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