रविवार, 20 नवंबर 2016

मुक्तक

तुम्हारे संग जिंदगी के हर इक लम्हे गुजारेंगे।
रूठकर के तो जाओ तुम सदा देकर पुकारेंगें।
अगर तुम जिंदगी भर के लिये जो हाँथ दोेगे,
तो तुम्हारे प्यार से हम जिंदगी अपनी संवारेंगें।
- अनुज

कालाधन सफाई पर मेरी भूमिका

*अतुकांत - _कालाधन की सफाई पर मेरी भी अहम् भूमिका है, जरा पढिये तो सही....हाँ बिलकुल पढिये_*

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तमाम उम्र की कमाई
संजोया था अपने गुल्लक में
अच्छा हुअा अच्छा हुआ
मेरा गुल्लक भरा रह गया।
गुल्लक का काला धन
रख दिया निकालकर
देखा तो मन द्रवित हुआ
परंतु टीस नही उठी
क्यों कि मेरे गुल्लक
का धन बरबाद नहीं
कठिन परिश्रम
सच्ची लगन से
बाईस कि उम्र में
बहुत दो दो बाईस किये
क्यो कि अपर्याप्त को
पर्याप्त मानकर
प्रसन्न रहा
खैर अब तो दो दो चार किया
और पाया कि
मेरे संतोषजनक
संतृप्त बटुए में
जिंदगी भर कि मेहनत
में ये मिला
दो चार चिल्लर
चार छ: दोस्त
फुटकर रिश्ते
बडे चेक का
बेरंग जीवन
एकाध खुशी
दो चार आंशू
चार छ: संकल्प
पचास ताने
सौ सपने
दो सौ ख्वाहिशें
पांच सौ ठोकरें
चिल्लर सफलताएँ
हजार असफलाएं
दस हजार विकल्प
लाख निराशाएं
दो लाख भावनाएं
करोड़ उत्सुकताएं
ऐसे संजोते संजोते
मन को तृप्त करते
अपना गुल्लक
हाँ वही पुराना माँ का दिया
करोडो से भर दिया
आज जब देखा
नही कोई खेद
नहीं हैरान
बस सब अपना धन
एक बार में बिना संकोच
न कोई डर न ही भेदभाव
न ही काला धन को
सफेद करने की सोच
बस ज्यों का त्यों
हृदय के गुल्लक से
उछाल दिया गगन में
प्रसन्न हुआ, सांस ली
और फिर नयी सोच
आधे अधूरे सपनों के बीच
तेरे होने की खुशी
एक तेरा साथ मेरा लक्ष्य
तेरे साथ जीने कि ख्वाहिंशे
तुझे पाने की ललक
दो रास्ते अतीत की यादों के
और भविष्य कि योजनाओं के
पांच इक्छाएं सुख सम्पत्ति साधन
सफलता और स्वाभिमान की।
पांच विकल्प मेहनत प्रयास जिद सच और समर्पण के।
एक संकल्प बस तुझे खुश रखने का
पचास ठोकरों से पचास सीख
दो आंशू से अपनापन का अहसास
सौ असफलताओं से सौ संकल्प
दो रास्तों से एक रास्ता
अपने सपने अपना लक्ष्य
और हाँ, बहुत अच्छा हुअा
मेरे गुल्लक में नही था काला धन
पांच सौ हजार के दो चार नोट,
तो नही हुअा खाली गुल्लक
रह गया भरा भरा सा
तो नही हुआ निराश
बस खुशमय जीवन की एक आस

--- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश।

गजल

*गजल*

अब सुलगते हुये मंजर को बस जन्नत कर ले।
ठीक हो जाऊं जो तु फिर कहीं मन्नत कर ले।

जख्म लगते हैं मिरे दिल पर कम नही मालूम,
यार कुछ धार लगा पैना अब खंजर कर ले।

हम तो अपना दिल जलाते है इश्क की लौ में,
तुझको कुछ हो न सके दिल की हिफाजत कर ले।

शिकायत है नही कि मुझको तन्हा छोड गयी,
पर यार तु अब फिर किसी से मोहब्बत कर ले।

मुझसे सुनी जायेगी न देख तेरी ये खबर,
पहले मेरे मरने की तु सब यार इबादत कर ले।

'अश्क' चले जायेंगे तो लौटना नामुमकिन है,
यार बची हो कोई तो और शिकायत कर ले।
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-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

मुक्तक

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आसमाँ के आज क्यों सारे सितारे खो गये।
चल रहे थे जिस किनारे वो किनारे खो गये।
साथ देना चाहते जो हमसफर बनकर मेरा,
क्या ख़ता हम से हुई जो वो सहारे खो गये।
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अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

नारी - अतुकांत

रही नारी बेचारी
सामाज की मारी
थी संस्कार में
बाधित नारी/
दौर आधुनिक
पर जो नारी
विवशताओं से
मुक्त है नारी
जागरुक और
सुशिक्षित नारी
देश को उज्जवल
कर रहीं नारी/
भेदभाव मुक्त
रहेगी नारी
देश की गरिमा
बनेगी नारी
तत्पर प्रगति
करेगी नारी
सीमा पर भी
रहेगी नारी
कोई भी पद
पाये नारी
अति सम्मान
दिलाये नारी
पुरुषों को भी
मात दी नारी
विपदाओं पर
साथ दी नारी
उत्कृष्ट रहे
जितना भी नारी
संस्कार मुक्त
नहीं हो नारी
तभी राष्ट्रहित
करेगी नारी
और सम्मानित
रहेगी नारी/
कुछ ऐसे भी
मुक्त है नारी
घर परिवार
रीति पे भारी
नये शिरे प
चलती नारी
संस्कार मुक्त
रहती नारी
ऐसी उपमा
पाये नारी
कुल घातक
बन जाये नारी।

- अनुज

नारी प्रगति पर बेहतरीन कविता - अनुज कुमार गौतम

*आज राष्ट्रीय गृहणी दिवस (National Housewife Day) है, और नारी प्रगति का शीर्षक, इस पर एक प्रयास*

               *_कविता_*
***

नारी की महिमा बतलाऊं या उनकी प्रगति बखान कहूं।
जो मिला और मिल रहा राष्ट्र मे नारी का सम्मान कहूं।

शब्द सुमन मे मै बाँध सकूं यह मेरा है सामर्थ्य नहीं।
नारी प्रगति नही लिख पाऊं इतना भी असमर्थ्य नहीं।

देश कर रहा क्यों नारी का अतुलनीय सम्मान सदा।
नारी ने ही पथ दिखलाया आई हो चाहे जो विपदा।

नारी ने जोधाबाई बन कर अकबर को पथ दिखलाया था।
जीजाबाई ने अपने कौंशल से शिवा को वीर बनाया था।

देविशक्ति का लेकर स्वरुप देवों का साथ निभाया था।
रानी लक्ष्मी और पन्ना ने अद्भुत कौंशल दिखलाया था।

अब शोषण और गुलामी के वो दिन भी आखिर बीत गये।
अब प्रगति करेगी नारी और प्रतिदिन गायेगी गीत नये।

कब नारी पुरुषों से कम है और कहाँ नही है जा पायी।
बढी जा रही डोर प्रगति की जितनी भी बाधा आयी।

नारी ने अपने कौंशल से देश विदेश मे घूम लिया।
माउंट की चोटी पर चढकर अम्बर को भी चूम लिया।

और नारी भी सेना की वर्दी पहन कर पहरेदार हुयी।
राष्ट्र के खातिर मर मिटने का साहस ले कर तैयार हुयी।

पीढी दर पीढी प्रगति का नारी सचमुच आधार है।
मातृशक्ति बीते युग से नव युग तक का श्रृंगार है।

नारी शक्ति के हृदय बसा साहस भी अपरम्पार है।
प्रत्येक क्षेत्र मे ससम्मान पद पाना भी अधिकार है।

पुरुषों के संग कदम मिलाकर बढती जाती हैं आंगे।
आलौकिक कोई क्षेत्र नहीं जहाँ नारी स्वप्न नहीं जागे।

शासन और प्रशासन से प्रतिस्पर्द्धा तक हैं प्रतिभागी।
धरा से ले उन्मुक्त गगन तक नारी की प्रतिभा जागी।

कुल परिवार और देश का मान बढायी है नारी।
एक नही दो - दो मात्राएं नारी नर से भी भारी।

पहले रहती थी पर्दे मे अब प्रगति विवश वह लाज नहीं।
जो नारी का अपमान करे वो साक्षर सभ्य समाज नहीं।

नारी को शिक्षित होने दो और सम्मान बढाने दो।
मत समझो संस्कार मुक्त बस आंगे तो तक जाने दो।

यकीन करो एक दिन नारी खुशियों के तीर चलायेगी।
दया, प्रेम, श्रृंगार, शक्ति का मिश्रित नीर बहायेगी।

वह नीर कोई जल नीर नहीं वह देश उत्थान करायेगा।
नारी के संग पुरुषों को भी सम्मान समान दिलायेगा॥

चेतावनी - तोड मरोड अन्यत्र प्रकाशन वर्जित॥
Copyright © akgautam_2016

-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

शनिवार, 19 नवंबर 2016

गीत - मनुज रो रो क्यो जीवन बिताया

*गीत*

मनुज रो रो जीवन बिताया क्यो तुमने..
नमुमकिन से सपने सजाया क्यो तुमने....

ये दुनियाँ मे अपना कहाँ कौन होता।
जो ना  दर्द होता तो कब कौन रोता।
गिले यार शिकवे दिखाया क्यों तुमने,
मनुज रो रो जीवन बिताया क्यूं तुमने।

इस दुनियाँ में पंछी हजारो तरह के।
मगर जी रहे है सब अपने करम से।
फिर रिश्तों से अाश लगाया क्यूं तुमने।
मनुज रो रो जीवन बिताया क्यूं तुमने।

सफर जिंदगी का समझकर जिये पर।
सदा से सभी कि फिकर तो किये पर ।
मगर मान अपना गंवाया क्यूं तुमने,
मनुज रो रो जीवन बिताया क्यूं तुमने।

अभी वक्त है तुम जरा सम्हल जाओ।
चलो खैर सफर खैर पथ बदल जाओ।
परिश्रम का पैसा कमाया जो तुमने।
सफल जिंदगानी बनाया फिर तुमने।

सरे आम खुलकर के रोया क्यूं तुमने।
मनुज रो रो जीवन बिताया क्यूं तुमने।

---अनुज कुमार गौतम