*मोहब्बते नज्र एक गजल*
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नफा हो जाये हमको ऐसा तुम व्यापार मत करना।
नमालुम हो वफाए अहमियत तो प्यार मत करना।
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तुम्हे कितना भी आता हो मुश्किलों से उलझ जाना,
न हो मालूम गहराई तो दरिया पार मत करना।
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रूठना और मनाना इश्क मे तो लाजमी है पर,
बिछुड जाये हमेशा को ऐसा व्यवहार मत करना।
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सजालो चुनकर पुष्पों को तुम अपना चमन कितना भी,
कभी चुन चुन कर आशिक जिंदगी गुलजार मत करना।
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प्यार एक बार होता है जिसे चाहो उसे कर लो,
कभी होकर जुदा फिर जिंदगी बेकार मत करना।
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जंग कितनी भी गहरी हो उसे स्वीकार कर लेना,
मगर जंग ए मोहब्बत मे कभी तुम वार मत करना।
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शौक तो है तुम्हारी घूमना बाजार मे बेशक़,
मगर सौदा मोहब्बत का सर ए बाजार मत करना।
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चांद तो रोज निकलेगा मगर रिश्ते नही बनते,
कभी बन जाये ग़र रिश्ता तो फिर इकरार मत करना।
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वफा ए चाह वस्ल ए दिल किसी घर मे पनपते हों,
कभी उस घर के अंदर तुम कोई दीवार मत करना।
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नशा करना वफा का है तो मिलकर खूब़ करते हैं,
मगर ये मय़ नही है इश़्क है हर बार मत करना॥
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फलक के सब सितारों को बना को दोस्त अपना तुम,
सिवाए 'अश्क' के तुम पर किसी से प्यार मत करना।
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akgautam_2016
-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश
हार्दिक स्वागत् अभिनंदन .... सभी मौलिक सृजन है, कृपया स्नेहिल आशीर्वाद अवश्य प्रदान करें..परंतु किसी का रचना का तोड मरोड अन्यत्र प्रकाशित न करें..... जिंदगी मे कहाँ कौन कब जायेगा, साथ मे हैं तओ कुछ पल बिता लीजिये... अश्क
शनिवार, 19 नवंबर 2016
गजल - न हो मालूम गहराई तो दरिया पार मत करनट
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