अब निभाते हो कैसे वादे मुकर क्यो नहीं जाते।
कभी राहों से मेरी होकर गुजर क्यो नहीं जाते।
आयेगा नहीं कोई तुम्हें यूं ही समझाने के लिये,
अब अपने ही हालात से सुधर क्यों नहीं जाते।
मिलता है कहाँ खुदा और इश्क इस जहाँ में,
अब किस खौफ़ मे डूबे हो उभर क्यो नहीं जाते।
इज्ज़त औ' सहारे के बिना जीना नहीं बेहतर,
किस आस मे जीते हो अब मर क्यों नहीं जाते।
क्यों देखते हो शौक़ से लहरों की ये हलचल,
तुम मेरी तरह दरिया मे उतर क्यों नहीं जाते।
जिल्लत से जी रहे हो क्यों अब आप इस जहाँ में,
अपना नहीं है कोई तो मर क्यों नहीं जाते।
ऐ अश्क कत्ल का जुर्म तुम पर नही आने वाला,
दिल से किये इस वार मे सर क्यों नहीं जाते।
- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
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