शनिवार, 19 नवंबर 2016

दो अतुकांत कविताएं - तवायफ

*तवायफ*

(१)
तवायफ तो इस जहाँ की
है बुरी औरत मगर
आज कल के दौर पर
करती है बेशक सफर
दुनियाँ कि रीति रिवाजें
बहुत बदली जा रही है
धर्म अनुष्ठान व्रत कि
मोह पिघली जा रही है
संस्कारिक परिवार कि
सुसंस्कृतिक महिलाएं
सडको पे खा रही हैं।
घर से आजादी लेकर
वक्त बेवक्त आ रही हैं।
घूमती हैं बेझिझक वो
रात के बारह बजे
देखा हमने आंखो से खुद
राह में कितने दफे
इनकी नजरों से हुये
घायल न जाने वीर कितने
दे दगा और जा रहीं
है हुस्न कि जिस चाल से
होश वालों खबर कर लो
लौटेंगी ये बेहाल ये।
-----------★★★---------
(२)

तवायफ भी बेहद
लाजवाब प्रवृत्ति कि
औरत होती है।
सुंदर सजावट,
निखरता चेहरा
कोमल बदन
सौन्दर्ययुक्त तन
क्या बुराई है एक
तवायफ संग रात
बिताने में।
वैसे तो मेरी नजर मे
आजकल की
निर्लज्जित बेवफाओं से
लाख गुना अच्छी है।
तवायफ! हां तवायफ,
बेवफाएं कभी इसके साथ
कभी उसके साथ
सरेआम वफा कर रहीं हैं।
नही कोई खयाल
तन मन जतन का
बदन पर हजारों
जख्म सह रही हैं।
घर परिवार का
अपमान कर रही हैं
हजारों पुरुषों की
पनपती साया में
सहवास कर रही हैं
तब कहना है कि
एक तवायफ
बुरे प्रवृत्ति वाले
पुरुषों कि गंदी नजरों से
उनके कामुक इक्षाओं
कि पूर्ति कर
अनेक बहनों कि लाज
बचा रही हैं।
और इन सब बेवफाओं
से तो बेहतर है
कि तवायफ
एक कोठे तक ही
सीमित है।
---------------★★★-------------
-- अनुज

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