रविवार, 20 नवंबर 2016

मुक्तक

तुम्हारे संग जिंदगी के हर इक लम्हे गुजारेंगे।
रूठकर के तो जाओ तुम सदा देकर पुकारेंगें।
अगर तुम जिंदगी भर के लिये जो हाँथ दोेगे,
तो तुम्हारे प्यार से हम जिंदगी अपनी संवारेंगें।
- अनुज

कालाधन सफाई पर मेरी भूमिका

*अतुकांत - _कालाधन की सफाई पर मेरी भी अहम् भूमिका है, जरा पढिये तो सही....हाँ बिलकुल पढिये_*

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तमाम उम्र की कमाई
संजोया था अपने गुल्लक में
अच्छा हुअा अच्छा हुआ
मेरा गुल्लक भरा रह गया।
गुल्लक का काला धन
रख दिया निकालकर
देखा तो मन द्रवित हुआ
परंतु टीस नही उठी
क्यों कि मेरे गुल्लक
का धन बरबाद नहीं
कठिन परिश्रम
सच्ची लगन से
बाईस कि उम्र में
बहुत दो दो बाईस किये
क्यो कि अपर्याप्त को
पर्याप्त मानकर
प्रसन्न रहा
खैर अब तो दो दो चार किया
और पाया कि
मेरे संतोषजनक
संतृप्त बटुए में
जिंदगी भर कि मेहनत
में ये मिला
दो चार चिल्लर
चार छ: दोस्त
फुटकर रिश्ते
बडे चेक का
बेरंग जीवन
एकाध खुशी
दो चार आंशू
चार छ: संकल्प
पचास ताने
सौ सपने
दो सौ ख्वाहिशें
पांच सौ ठोकरें
चिल्लर सफलताएँ
हजार असफलाएं
दस हजार विकल्प
लाख निराशाएं
दो लाख भावनाएं
करोड़ उत्सुकताएं
ऐसे संजोते संजोते
मन को तृप्त करते
अपना गुल्लक
हाँ वही पुराना माँ का दिया
करोडो से भर दिया
आज जब देखा
नही कोई खेद
नहीं हैरान
बस सब अपना धन
एक बार में बिना संकोच
न कोई डर न ही भेदभाव
न ही काला धन को
सफेद करने की सोच
बस ज्यों का त्यों
हृदय के गुल्लक से
उछाल दिया गगन में
प्रसन्न हुआ, सांस ली
और फिर नयी सोच
आधे अधूरे सपनों के बीच
तेरे होने की खुशी
एक तेरा साथ मेरा लक्ष्य
तेरे साथ जीने कि ख्वाहिंशे
तुझे पाने की ललक
दो रास्ते अतीत की यादों के
और भविष्य कि योजनाओं के
पांच इक्छाएं सुख सम्पत्ति साधन
सफलता और स्वाभिमान की।
पांच विकल्प मेहनत प्रयास जिद सच और समर्पण के।
एक संकल्प बस तुझे खुश रखने का
पचास ठोकरों से पचास सीख
दो आंशू से अपनापन का अहसास
सौ असफलताओं से सौ संकल्प
दो रास्तों से एक रास्ता
अपने सपने अपना लक्ष्य
और हाँ, बहुत अच्छा हुअा
मेरे गुल्लक में नही था काला धन
पांच सौ हजार के दो चार नोट,
तो नही हुअा खाली गुल्लक
रह गया भरा भरा सा
तो नही हुआ निराश
बस खुशमय जीवन की एक आस

--- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश।

गजल

*गजल*

अब सुलगते हुये मंजर को बस जन्नत कर ले।
ठीक हो जाऊं जो तु फिर कहीं मन्नत कर ले।

जख्म लगते हैं मिरे दिल पर कम नही मालूम,
यार कुछ धार लगा पैना अब खंजर कर ले।

हम तो अपना दिल जलाते है इश्क की लौ में,
तुझको कुछ हो न सके दिल की हिफाजत कर ले।

शिकायत है नही कि मुझको तन्हा छोड गयी,
पर यार तु अब फिर किसी से मोहब्बत कर ले।

मुझसे सुनी जायेगी न देख तेरी ये खबर,
पहले मेरे मरने की तु सब यार इबादत कर ले।

'अश्क' चले जायेंगे तो लौटना नामुमकिन है,
यार बची हो कोई तो और शिकायत कर ले।
----★★★---

-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

मुक्तक

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आसमाँ के आज क्यों सारे सितारे खो गये।
चल रहे थे जिस किनारे वो किनारे खो गये।
साथ देना चाहते जो हमसफर बनकर मेरा,
क्या ख़ता हम से हुई जो वो सहारे खो गये।
-------
अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

नारी - अतुकांत

रही नारी बेचारी
सामाज की मारी
थी संस्कार में
बाधित नारी/
दौर आधुनिक
पर जो नारी
विवशताओं से
मुक्त है नारी
जागरुक और
सुशिक्षित नारी
देश को उज्जवल
कर रहीं नारी/
भेदभाव मुक्त
रहेगी नारी
देश की गरिमा
बनेगी नारी
तत्पर प्रगति
करेगी नारी
सीमा पर भी
रहेगी नारी
कोई भी पद
पाये नारी
अति सम्मान
दिलाये नारी
पुरुषों को भी
मात दी नारी
विपदाओं पर
साथ दी नारी
उत्कृष्ट रहे
जितना भी नारी
संस्कार मुक्त
नहीं हो नारी
तभी राष्ट्रहित
करेगी नारी
और सम्मानित
रहेगी नारी/
कुछ ऐसे भी
मुक्त है नारी
घर परिवार
रीति पे भारी
नये शिरे प
चलती नारी
संस्कार मुक्त
रहती नारी
ऐसी उपमा
पाये नारी
कुल घातक
बन जाये नारी।

- अनुज

नारी प्रगति पर बेहतरीन कविता - अनुज कुमार गौतम

*आज राष्ट्रीय गृहणी दिवस (National Housewife Day) है, और नारी प्रगति का शीर्षक, इस पर एक प्रयास*

               *_कविता_*
***

नारी की महिमा बतलाऊं या उनकी प्रगति बखान कहूं।
जो मिला और मिल रहा राष्ट्र मे नारी का सम्मान कहूं।

शब्द सुमन मे मै बाँध सकूं यह मेरा है सामर्थ्य नहीं।
नारी प्रगति नही लिख पाऊं इतना भी असमर्थ्य नहीं।

देश कर रहा क्यों नारी का अतुलनीय सम्मान सदा।
नारी ने ही पथ दिखलाया आई हो चाहे जो विपदा।

नारी ने जोधाबाई बन कर अकबर को पथ दिखलाया था।
जीजाबाई ने अपने कौंशल से शिवा को वीर बनाया था।

देविशक्ति का लेकर स्वरुप देवों का साथ निभाया था।
रानी लक्ष्मी और पन्ना ने अद्भुत कौंशल दिखलाया था।

अब शोषण और गुलामी के वो दिन भी आखिर बीत गये।
अब प्रगति करेगी नारी और प्रतिदिन गायेगी गीत नये।

कब नारी पुरुषों से कम है और कहाँ नही है जा पायी।
बढी जा रही डोर प्रगति की जितनी भी बाधा आयी।

नारी ने अपने कौंशल से देश विदेश मे घूम लिया।
माउंट की चोटी पर चढकर अम्बर को भी चूम लिया।

और नारी भी सेना की वर्दी पहन कर पहरेदार हुयी।
राष्ट्र के खातिर मर मिटने का साहस ले कर तैयार हुयी।

पीढी दर पीढी प्रगति का नारी सचमुच आधार है।
मातृशक्ति बीते युग से नव युग तक का श्रृंगार है।

नारी शक्ति के हृदय बसा साहस भी अपरम्पार है।
प्रत्येक क्षेत्र मे ससम्मान पद पाना भी अधिकार है।

पुरुषों के संग कदम मिलाकर बढती जाती हैं आंगे।
आलौकिक कोई क्षेत्र नहीं जहाँ नारी स्वप्न नहीं जागे।

शासन और प्रशासन से प्रतिस्पर्द्धा तक हैं प्रतिभागी।
धरा से ले उन्मुक्त गगन तक नारी की प्रतिभा जागी।

कुल परिवार और देश का मान बढायी है नारी।
एक नही दो - दो मात्राएं नारी नर से भी भारी।

पहले रहती थी पर्दे मे अब प्रगति विवश वह लाज नहीं।
जो नारी का अपमान करे वो साक्षर सभ्य समाज नहीं।

नारी को शिक्षित होने दो और सम्मान बढाने दो।
मत समझो संस्कार मुक्त बस आंगे तो तक जाने दो।

यकीन करो एक दिन नारी खुशियों के तीर चलायेगी।
दया, प्रेम, श्रृंगार, शक्ति का मिश्रित नीर बहायेगी।

वह नीर कोई जल नीर नहीं वह देश उत्थान करायेगा।
नारी के संग पुरुषों को भी सम्मान समान दिलायेगा॥

चेतावनी - तोड मरोड अन्यत्र प्रकाशन वर्जित॥
Copyright © akgautam_2016

-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

शनिवार, 19 नवंबर 2016

गीत - मनुज रो रो क्यो जीवन बिताया

*गीत*

मनुज रो रो जीवन बिताया क्यो तुमने..
नमुमकिन से सपने सजाया क्यो तुमने....

ये दुनियाँ मे अपना कहाँ कौन होता।
जो ना  दर्द होता तो कब कौन रोता।
गिले यार शिकवे दिखाया क्यों तुमने,
मनुज रो रो जीवन बिताया क्यूं तुमने।

इस दुनियाँ में पंछी हजारो तरह के।
मगर जी रहे है सब अपने करम से।
फिर रिश्तों से अाश लगाया क्यूं तुमने।
मनुज रो रो जीवन बिताया क्यूं तुमने।

सफर जिंदगी का समझकर जिये पर।
सदा से सभी कि फिकर तो किये पर ।
मगर मान अपना गंवाया क्यूं तुमने,
मनुज रो रो जीवन बिताया क्यूं तुमने।

अभी वक्त है तुम जरा सम्हल जाओ।
चलो खैर सफर खैर पथ बदल जाओ।
परिश्रम का पैसा कमाया जो तुमने।
सफल जिंदगानी बनाया फिर तुमने।

सरे आम खुलकर के रोया क्यूं तुमने।
मनुज रो रो जीवन बिताया क्यूं तुमने।

---अनुज कुमार गौतम

दो अतुकांत कविताएं - तवायफ

*तवायफ*

(१)
तवायफ तो इस जहाँ की
है बुरी औरत मगर
आज कल के दौर पर
करती है बेशक सफर
दुनियाँ कि रीति रिवाजें
बहुत बदली जा रही है
धर्म अनुष्ठान व्रत कि
मोह पिघली जा रही है
संस्कारिक परिवार कि
सुसंस्कृतिक महिलाएं
सडको पे खा रही हैं।
घर से आजादी लेकर
वक्त बेवक्त आ रही हैं।
घूमती हैं बेझिझक वो
रात के बारह बजे
देखा हमने आंखो से खुद
राह में कितने दफे
इनकी नजरों से हुये
घायल न जाने वीर कितने
दे दगा और जा रहीं
है हुस्न कि जिस चाल से
होश वालों खबर कर लो
लौटेंगी ये बेहाल ये।
-----------★★★---------
(२)

तवायफ भी बेहद
लाजवाब प्रवृत्ति कि
औरत होती है।
सुंदर सजावट,
निखरता चेहरा
कोमल बदन
सौन्दर्ययुक्त तन
क्या बुराई है एक
तवायफ संग रात
बिताने में।
वैसे तो मेरी नजर मे
आजकल की
निर्लज्जित बेवफाओं से
लाख गुना अच्छी है।
तवायफ! हां तवायफ,
बेवफाएं कभी इसके साथ
कभी उसके साथ
सरेआम वफा कर रहीं हैं।
नही कोई खयाल
तन मन जतन का
बदन पर हजारों
जख्म सह रही हैं।
घर परिवार का
अपमान कर रही हैं
हजारों पुरुषों की
पनपती साया में
सहवास कर रही हैं
तब कहना है कि
एक तवायफ
बुरे प्रवृत्ति वाले
पुरुषों कि गंदी नजरों से
उनके कामुक इक्षाओं
कि पूर्ति कर
अनेक बहनों कि लाज
बचा रही हैं।
और इन सब बेवफाओं
से तो बेहतर है
कि तवायफ
एक कोठे तक ही
सीमित है।
---------------★★★-------------
-- अनुज

गजल - साथ चलकर के देखो

मेरे रहनुमा साथ चलकर कर के देखो।
मिलो जब गले से तो लगकर के देखो।
मेरे दिल से बहती मोहब्बत की लहरें,
उसी लहर मे तुम उतर कर के देखो।
मेरी बात छोडो कि क्या कह रहा हूं,
खुद के भी दिल की सुनकर के देखो।
नही मन भरा चलते चलते जो देखा,
तो पल दो पलों तक ठहरकर के देखो।
अगर जानना है शराफत मेरी तब,
मेरे ही मकां से गुजर कर के देखो।
अगर चाहते हो हयात ए अश्क की,
तो गजलों में मेरी सिमटकर के देखो।

---- अनुज

गजल - आज सब मौसम ए गुल मे ढलने लगे

*गजल*

आज सब मौसमे गुल मे ढलने लगे।
हम सुनें हैं देश के दिन बदलने लगे।
क्यूं पडे आदमी यूं ही बीमार न,
वक्त बे-वक्त जो मौसम बदलने लगे।
इल्म काला हो गोरा पर मेहनत का हो,
आहटें सुन नही नब्ज रुकने लगे।
लोग सदमे मे आ गये खबर सुनते ही
लौह भी स्वर्ण मे न बदलने लगे।
लडकियों मे खुशी की लहर छा गयी,
पिंक नोटों के चर्चे जो चलने लगे।
काला धन गोरे मे जब बदल जा चुका,
वो वापसी धन का ऐलान करने लगे।
नीति और राजनीति पे बोले ही थे,
उनके चमचों के तेवर बदलने लगे।
चाय खाँसी कभी साथ होगी नहीं,
एक को लेते ही एक उगलने लगे।
अश्क तुझको दिनों से शिकायत नहीं,
तेरे गुलशन के गुल तो महकने लगे।
--------------------------------------------
--- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

गजल - नफरतों कि हवाएं

नफरतों की हवाएं जब चलने लगे।
यूं चराग ए मोहब्बत भी बुझने लगे।
जी सकेंगे तुम्हारे बिना हम नहीं,
हम जब मरने लगे तब वो कहने लगे।
एक दफा लौट आओ तुम मेरे लिये,
हाँथ रखकर के सर पर सिसकने लगे।
अब जरुरत नहीं शख्स को इल्म की
काँच के घर मे जूते जो बिकने लगे।
लोग कहते हैं शायद यही इश्क है,
नाम लेते ही तबियत मचलने लगे।
मिल गये राह चलते कदम से कदम,
रास्ता हम अचानक भटकने लगे।
है जमाना अलग और नयी रंग है,
देख उनको कली फूल बनने लगे।
जब अनुज हांथ ले उनका चलने लगे,
देख कर दुनियाँ वाले भी जलने लगे।
------
--- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

फर्द के शेर - वफा/बेवफा

आप सभी मोहब्बतों के हवाले चंद शेर.....

★वफाएं_बेवफाएं★
***
कुछ तो कमियाँ रहीं होंगी तुझमे 'अश्क'
वरना यूं ही कोई साथ नहीं छोड जाता।
***
तेरे इंसानियत कि बात थी अश्क, जो वो तेरे हो गये।
वरना साथ तो उनका भी छूटा है जिनके सात फेरे हो गये।
***
ये बात और है कि वो प्यार से छोड गये साहब,
वरना अांधियों कि तरह धक्का देना हमें भी आता था।
***
अगर दिलों मे जरा सी चाहतें पनाह लेतीं,
तो आज कोई लड़की बेवफा नहीं होती।
***
एक बावफा ने कदम क्या रख दिया महफिल में,
सारे बेवफाओं के सर झुके के झुके रह गये।
***
एक बावफा ने खुदखुशी कर ली ये सोच कर,
बेवफाओं कि दुनियाँ मे हमारा है नहीं कोई॥
***
बीते अरसे के बाद आज चेहरा चमक गया,
सूनी राहों पे कोई आइना सा खनक गया।
----------★★★-------

अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

कता - मयकदा

आपकी मोहब्बतों के हवाले से मयखानों पर चंद मिसरे....

***
आज किस खुशी में गुलाब बांट रहें हैं
हम भी आ गये सुना शराब बांट रहें हैं
भीड़ लग गयी मरीज ए मोहब्बतों की,
सुने दिल जोडनेकी किताब बांट रहे हैं
***
***
मै मय-कदे की राह से गुजरना भी छोड दूं
तु कहे तो गिलास क्या बोतल भी फोड दूं
एक बार लग जा आके अगर गले से मेरे,
सिंगरेट शराब बीडी औ गुटका भी छोड दूं
***
***
सुने शाकी को एक बार पढें।
मस्जिद को न बियरबार पढें।
मुद्दतों बाद आया खत उनका,
तो क्यो न वो हजार बार पढें।
***
***
आप वेफजूल ये वहम् करते है,
जो कोई नही करता हम करते है।
जब भूल गये हो ठीक तरह से,
तो अब शराब पीना कम करते हैं
***
***
--- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

कता

मोहब्बत ए नज्र एक कता़
****
हो सुबह क्या गयी सब पंछी चहक मे खो गये।
वो गुलसिते मे जाकर महक ए गुलाब खो गये।
नाजुक ए हाल मयकदे मे देख सब चकरा गये,
यूं अपने ही हालात में हम भी फफक के रो गये।
***

- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

गजल - न हो मालूम गहराई तो दरिया पार मत करनट

*मोहब्बते नज्र एक गजल*
-------
नफा हो जाये हमको ऐसा तुम व्यापार मत करना।
नमालुम हो वफाए अहमियत तो प्यार मत करना।
***
तुम्हे कितना भी आता हो मुश्किलों से उलझ जाना,
न हो मालूम गहराई तो दरिया पार मत करना।
***
रूठना और मनाना इश्क मे तो लाजमी है पर,
बिछुड जाये हमेशा को ऐसा व्यवहार मत करना।
***
सजालो चुनकर पुष्पों को तुम अपना चमन कितना भी,
कभी चुन चुन कर आशिक जिंदगी गुलजार मत करना।
***
प्यार एक बार होता है जिसे चाहो उसे कर लो,
कभी होकर जुदा फिर जिंदगी बेकार मत करना।
***
जंग कितनी भी गहरी हो उसे स्वीकार कर लेना,
मगर जंग ए मोहब्बत मे कभी तुम वार मत करना।
***
शौक तो है तुम्हारी घूमना बाजार मे बेशक़,
मगर सौदा मोहब्बत का सर ए बाजार मत करना।
***
चांद तो रोज निकलेगा मगर रिश्ते नही बनते,
कभी बन जाये ग़र रिश्ता तो फिर इकरार मत करना।
***
वफा ए चाह वस्ल ए दिल किसी घर मे पनपते हों,
कभी उस घर के अंदर तुम कोई दीवार मत करना।
***
नशा करना वफा का है तो मिलकर खूब़ करते हैं,
मगर ये मय़ नही है इश़्क है हर बार मत करना॥
***
फलक के सब सितारों को बना को दोस्त अपना तुम,
सिवाए 'अश्क' के तुम पर किसी से प्यार मत करना।
***
Copyright © All right reversed
akgautam_2016
-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

फर्द के शेर - मयकदा/मधुशाला

आप सभी की मोहब्बतों के हवाले से चंद अशार....

"मयकदा_मधुशाला_मयखाना"

****
आखिर तक वस्ल ए चाह मे दिल ऊब सा गया,
फिर जा कर मयकदे मे हम संजीदा हो गये।
***
अहिस्ते अहिस्ते हम महफिल मे रंग लाते हैं।
नहीं फिर मयखाने मे जाकर जाम लगाते हैं।
***
साकी मै आ गया हूं अब पीने के मूड में,
दारू गिलास और चने मिर्च ला के रख।
***
मयकदे से क्या गुजर गये खुमार छा गया।
बस शाम ढलते वक्त़ से बुखार आ गया।
***
न पीना आता है न पिलाने का कोई शहूर है,
जाने कैसे कैसे लोग मधुशाला तक पहुंच आते हैं।
***
मोहब्बत की दुनियाँ में साहब अकाल पड़ गये,
ऐसी बात नही हुजूर पीते पीते मेरे बाल पक गये।
***
मुद्दतों बाद आज फिर से आई याद तेरी,
इतफाक मयकदे से होकर गुजर रहे थे।
***
मंदिर मस्जिद मयखाना या धर्मविरोधी कुछ बोलो,
आशिक हो या रिंद बेचारा उसके ऊपर मत बोलो।
***
मेरी शायरी मे मय-कदे का जिक्र हो रहा है।
क्या उन्हे भी मेरा कोई अब फिक्र हो रहा है।
***
जा रहे हैं मयकदे मे एक दोस्त एक बुजुर्ग,
हम भी हुये बर्बाद जाम ए सिलसिले में हैं।
***
जिंदगी से ऊब जायें तो पल पल का हिसाब किया करें,
जब कोई भी आफत आये तो जाम पे जाम पिया करें।
***
इन्हे भी किसी बेवफा ने ठुकरा दिया है शायद,
जख्म ए वफा कि राह मे फिसलने वाले थे।
***
क्या इन्हे भी इश्क मे दर्द ए बेवफाई नसीब हुई अश्क,
मयकदे मे चुड़ी कंगन खरीदने आ गये।
***
खुद पियो मत शराब अभी जग रहा है शाकी,
आराम से लीजिये जनाब अभी रात है बाकी।
***
मेरी शायरियों को वास्तविक नहीं काल्पनिक समझें,
कुछ ज्यादा ही समझना हो तो मयकदे पहुंचे।
***
अब बैठे हो किसलिये बात ए तमाम हो गयी,
चलो चलकर पिये शराब आधी रात हो गयी।
***
न तुझको फिकर है न मुझको खबर है,
चलो मयकदे फिर वहीं बात होगी।
***
वो महबूबा की यादों मे रास्ता भटक गये थे,
क्यो कि मयकदे मे भी गिलास खनक गये थे॥
***
कुछ नही कह सकता मेरा नशा उतर गया।
स्वेटर निकाल रखा क्या चूहा कुतर गया।
***
---
अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

वफा ए चाह गजल

"वफा ए चाह - गज़ल"

*वफा ए चाह पर मैने पहली मर्तबा यूं ही एक गजल लिखी, जरूर पढें*
*****
प्यास सागर की निगाहों मे छिपा रक्खी है।
आपके होंठो से बडी आस लगा रक्खी है।

(शेर में शायर होंठो से कुछ अहसास के लब्ज सुनने कि आस रखता है)
*****
तेरी खूबसूरती अब कैसे तुझे आये नज़र,
तेरी सूरत जो हमने दिल मे छिपा रक्खी है।
*****
तेरी बातों को भुलाना नहीं आता हमको,
तेरी खुशबू जो अब लब़्जों मे बसा रक्खी है।
*****
यूं ही नही आया हमें हुनर मोहब्बत वाला,
तेरी वफा ए चाह जो खयालों मे बसा रक्खी है।
*****
कैसे तिरे बिन कहें खुद को मुकम्मल 'अनुज',
तुम मेरी हो ये जो दुनियाँ को बता रक्खी है।

-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश
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मुक्तक

दो मुक्तक

★★★★★★★★★★★★★★
★★★★★★★★★★★★★★
आपको सुंदर जन्मदिवस पर पुलकित नयी बहार मिले।
घर परिवार सुभग सुंदर हो पापा की मीठी मनुहार मिले।
हो भविष्य आपका उज्जवल प्रतिपल आप प्रसन्न रहें,
बचपन की सखियों संग आपको साजन का भी प्यार मिले।

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आपको आपके जीवन मे सुन्दर सा  इक  संसार मिले।
जिस घर मे जाओ खुशियों का भरा हुआ परिवार मिले।
हमारी दुनियाँ तो बस तुमने ने उजाड़ रखी है गौतम,
पर दुआ. हमारी  यही  आपको  सुंदर सा घर द्वार मिले।

★★★★★★★★★★★★★★
🌹🎂🎂🎂💐🎂🎂🎂🌹
★★★★★★★★★★★★★★

ईश स्तुति के दो मुक्तक - अनुज

करबद्ध वंदन कर रहा प्रभु धन्य हो स्वीकारिये।
साहित्य साधक नाथ हूं स्वामी मुझे न बिसारिये।
प्रभु आप जैसा जगत् में अन्य कोई है नहीं,
नित चरण मस्तक मै नवाउं नमन को स्वीकारिये।

स्वीकार अभिनंदन करें नित हाथ मस्तक धारिये।
लिखते रहें साहित्य हम कविता मे मेरी समाइये।
मै धूर्त बालक अबोध हूं है ज्ञान भी कोई नहीं,
हम भी हों सपुनीत कवि अब आप जो मन लाइये।

प्रभु की महिमा का सदा, करता रहूं बखान।
नाथ दया कर दें अगर, पल मे हो उत्थान।
★★★
---- अनुज कुमार

मदिरा सवैया छंद - अनुज

मुखडा सौंदर्य से दमक रहो।
छवि आंखन अतिशय भाय रही।

छाई नभ मे घनघोर घटा।
उर बगिया साँझ सुहाय रही।

उर में व्यापत है काम कला।
रति देख दशा बहकाय रही।

जब सेज चढे सजना सजनी।
सखि देखि देखि मुस्काय रही।

कछु कहत बनय नहीं बात सही।
सखि आय रही सखि जाय रही।

कब अइहैं अब सजना मोरे।
सखि सोच सोच भरमाय रही।

उर उपवन बाग निहार रही,
व्याकुल मति नीर बहाय रही।

प्रिय नेह को नैना तरस रहे।
सखि मंद मंद मुसकाय रही।

-- अनुज कुमार गौतम अश्क

स्तुति - मुक्तक - हे नाथ विनय...

हे नाथ विनय बालक केरी सब मंगल काज सफल कीजै।
उत्फुल्ल रहे हर एक व्यक्ति सचराचर जहाँ सकल कीजै।
नित भोर से सांझ सुहावन हो मन द्रवित नही होने पाये,
उजडे बिछुडे इन पुष्पों को अब सुन्दर नाथ कमल कीजै।
--- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

गजल - जिंदगी गुजारी है

*इस गजल को दिल से पढना, फिर एक बार सोचना...आंशू न आ जाये तो कहना*

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प्यार के भरोसे में हमने जिंदगी गुजारी है,
जिंदगी भी अपनी है मौत भी हमारी है।
-
बचकर हम किधर जाये इस दर्द ए मोहब्बत से,
तेरे गोद मे सोने की हमे खास ए बिमारी है।
-
माँ ने साथ छोडा था क्या कसूर मेरा था,
तुम भी दूर जाती हो ये दिल की मारामारी है।
-
कर कुछ नही सकता झूठें तेरे वादों पर,
कल भी यही बातें थी आज वही जारी है।
-
कह दो दुनियाँ वालों से हम भी इश्क करते हैं
वो बेवफा तुम्हारी थी ये बावफा हमारी है।
(बावफा - बेवफा का उल्टा मतलब अच्छी लडकी)
-
तुमको प्यार करने को जो मिले दुनियाँ में,
छोड़ मुझे कर लेना ये बस यही होशियारी है।
-
मुझसे रिश्ता तोड ही लिया फिर मुझे अब क्या कहना,
चाहे जिससे प्यार कीजिये अब ये जिंदगी तुम्हारी है।
-----★★★-----
-- अनुज कुमार गौतम अश्क
-- Pt Anuj Kumar Gautam "अश़्क निर्मोही"

गजल - गुजर क्यो नही जाते

अब निभाते हो कैसे वादे मुकर क्यो नहीं जाते।
कभी राहों से मेरी होकर गुजर क्यो नहीं जाते।

आयेगा नहीं कोई तुम्हें यूं ही समझाने के लिये,
अब अपने ही हालात से सुधर क्यों नहीं जाते।

मिलता है कहाँ खुदा और इश्क इस जहाँ में,
अब किस खौफ़ मे डूबे हो उभर क्यो नहीं जाते।

इज्ज़त औ' सहारे के बिना जीना नहीं बेहतर,
किस आस मे जीते हो अब मर क्यों नहीं जाते।

क्यों देखते हो शौक़ से लहरों की ये हलचल,
तुम मेरी तरह दरिया मे उतर क्यों नहीं जाते।

जिल्लत से जी रहे हो क्यों अब आप इस जहाँ में,
अपना नहीं है कोई तो मर क्यों नहीं जाते।

ऐ अश्क कत्ल का जुर्म तुम पर नही आने वाला,
दिल से किये इस वार मे सर क्यों नहीं जाते।

- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

गजल - आप आये हुये हैं

जख्म क्यों इस कदर आप खाये हुये है।
मुद्दतों बाद फिर आज आये हुये हैं।

शोक क्या आप पर इस कदर छा गया,
देर से आये हैं क्यों घबराये हुये हैं।

हुआ क्या है हमें भी बताओ जरा,
ये क्यों आप चेहरा झुकाये हुये हैं।

बेवफाओं से तुम कर लो मोहब्बत,
चराग ए वफा सब बुझाये हुये हूं।

चलो बाग चल कर जरा देखते हैं,
हम सुने लोग क्या गुल खिलाये हुये हैं।

जरा बैठ कर बात हमसे भी कर लो,
जानते है तेरे यार आये हुये हैं।

देख कर के तुम्हे  कयामत हुई,
बाद वर्षों जो हम मुस्कुराये हुये हैं।

- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

नज्म - शाम होने लगी

काफी दिनों बाद आप सबकी मोहब्बतों के हवाले एक नज़्म..
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शाम होने लगी, सूर्य ढलने लगे।
साथ मे अब हमारे वो चलने लगे॥
वो सुनाने लगे स्वर मधुर रात मे,
दिले दीपक सदा सुन के जलने लगे॥
देखकर साथ उनके मुझे लोग सब,
हांथ मे हांथ रखकर के मलने लगे।
जब भी करना पडा हो सफर मेरे बिन,
बात कहते अहद अश्क बहने लगे।
हम मिलें हैं हजारों दिनों बाद अब,
तन्हा रहने की बातें वो कहने लगे।
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अनुज कुमार गौतम 'अश्क'

गजल -- याद उनकी अब आने लगी


याद उनकी है आने लगी।
बात दिल पे स'माने लगी॥
रह गया चोंट खाया हुआ।
आंख आंशू ब'हाने लगी॥
गुल खिले बाग मे'शाम को
बुलबुलें स्वर सुनाने लगी।
रोंक ले काश आकर कोई
मौत मेरी अब आने लगी॥
हम निकल यूं गये बज़्म से
जख़्म देकर ब'ताने लगी॥

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अनुज कुमार गौतम