बुधवार, 2 नवंबर 2016

कविता - मै हुअा निशब्द

----कविता----
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हुआ मै निशब्द
नहि पता अर्थ
खो गये शब्द
सब लेख व्यर्थ
चल पडे दूर
यूं बिन कसूर
ये जहाँ क्रूर
निष्ठुर गुरूर
लगा प्रीति बाण
नहि बची आन
तज दिये प्राण
निकली न जान
अद्भुत सुयोग       ... / संयोग
हृदयादि रोग
उनसे वियोग
हैं कैसे लोग
रहे प्रेम जोह
हुआ फिर विछोह
वो देख मोह
कह दिये ओह
फिर भी अघात
समझे न बात
हुआ हृदयघात
गये छोड साथ
बिन डालि फूल
तब भी वसूल
नही कोई मूल
चुभते त्रिशूल
लगा दोष पाप
कैसा अभिशाप
हे प्रभु आप
हरना ये ताप
गयी रूह काँप
ये कैसा प्यार
करना न कभी
अब अनुज आप।

Copyright © akgautam_2016
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अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

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