रविवार, 20 नवंबर 2016

गजल

*गजल*

अब सुलगते हुये मंजर को बस जन्नत कर ले।
ठीक हो जाऊं जो तु फिर कहीं मन्नत कर ले।

जख्म लगते हैं मिरे दिल पर कम नही मालूम,
यार कुछ धार लगा पैना अब खंजर कर ले।

हम तो अपना दिल जलाते है इश्क की लौ में,
तुझको कुछ हो न सके दिल की हिफाजत कर ले।

शिकायत है नही कि मुझको तन्हा छोड गयी,
पर यार तु अब फिर किसी से मोहब्बत कर ले।

मुझसे सुनी जायेगी न देख तेरी ये खबर,
पहले मेरे मरने की तु सब यार इबादत कर ले।

'अश्क' चले जायेंगे तो लौटना नामुमकिन है,
यार बची हो कोई तो और शिकायत कर ले।
----★★★---

-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश

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