शनिवार, 19 नवंबर 2016

ईश स्तुति के दो मुक्तक - अनुज

करबद्ध वंदन कर रहा प्रभु धन्य हो स्वीकारिये।
साहित्य साधक नाथ हूं स्वामी मुझे न बिसारिये।
प्रभु आप जैसा जगत् में अन्य कोई है नहीं,
नित चरण मस्तक मै नवाउं नमन को स्वीकारिये।

स्वीकार अभिनंदन करें नित हाथ मस्तक धारिये।
लिखते रहें साहित्य हम कविता मे मेरी समाइये।
मै धूर्त बालक अबोध हूं है ज्ञान भी कोई नहीं,
हम भी हों सपुनीत कवि अब आप जो मन लाइये।

प्रभु की महिमा का सदा, करता रहूं बखान।
नाथ दया कर दें अगर, पल मे हो उत्थान।
★★★
---- अनुज कुमार

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