आप सभी की मोहब्बतों के हवाले से चंद अशार....
"मयकदा_मधुशाला_मयखाना"
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आखिर तक वस्ल ए चाह मे दिल ऊब सा गया,
फिर जा कर मयकदे मे हम संजीदा हो गये।
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अहिस्ते अहिस्ते हम महफिल मे रंग लाते हैं।
नहीं फिर मयखाने मे जाकर जाम लगाते हैं।
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साकी मै आ गया हूं अब पीने के मूड में,
दारू गिलास और चने मिर्च ला के रख।
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मयकदे से क्या गुजर गये खुमार छा गया।
बस शाम ढलते वक्त़ से बुखार आ गया।
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न पीना आता है न पिलाने का कोई शहूर है,
जाने कैसे कैसे लोग मधुशाला तक पहुंच आते हैं।
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मोहब्बत की दुनियाँ में साहब अकाल पड़ गये,
ऐसी बात नही हुजूर पीते पीते मेरे बाल पक गये।
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मुद्दतों बाद आज फिर से आई याद तेरी,
इतफाक मयकदे से होकर गुजर रहे थे।
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मंदिर मस्जिद मयखाना या धर्मविरोधी कुछ बोलो,
आशिक हो या रिंद बेचारा उसके ऊपर मत बोलो।
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मेरी शायरी मे मय-कदे का जिक्र हो रहा है।
क्या उन्हे भी मेरा कोई अब फिक्र हो रहा है।
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जा रहे हैं मयकदे मे एक दोस्त एक बुजुर्ग,
हम भी हुये बर्बाद जाम ए सिलसिले में हैं।
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जिंदगी से ऊब जायें तो पल पल का हिसाब किया करें,
जब कोई भी आफत आये तो जाम पे जाम पिया करें।
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इन्हे भी किसी बेवफा ने ठुकरा दिया है शायद,
जख्म ए वफा कि राह मे फिसलने वाले थे।
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क्या इन्हे भी इश्क मे दर्द ए बेवफाई नसीब हुई अश्क,
मयकदे मे चुड़ी कंगन खरीदने आ गये।
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खुद पियो मत शराब अभी जग रहा है शाकी,
आराम से लीजिये जनाब अभी रात है बाकी।
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मेरी शायरियों को वास्तविक नहीं काल्पनिक समझें,
कुछ ज्यादा ही समझना हो तो मयकदे पहुंचे।
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अब बैठे हो किसलिये बात ए तमाम हो गयी,
चलो चलकर पिये शराब आधी रात हो गयी।
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न तुझको फिकर है न मुझको खबर है,
चलो मयकदे फिर वहीं बात होगी।
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वो महबूबा की यादों मे रास्ता भटक गये थे,
क्यो कि मयकदे मे भी गिलास खनक गये थे॥
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कुछ नही कह सकता मेरा नशा उतर गया।
स्वेटर निकाल रखा क्या चूहा कुतर गया।
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अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
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