"वफा ए चाह - गज़ल"
*वफा ए चाह पर मैने पहली मर्तबा यूं ही एक गजल लिखी, जरूर पढें*
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प्यास सागर की निगाहों मे छिपा रक्खी है।
आपके होंठो से बडी आस लगा रक्खी है।
(शेर में शायर होंठो से कुछ अहसास के लब्ज सुनने कि आस रखता है)
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तेरी खूबसूरती अब कैसे तुझे आये नज़र,
तेरी सूरत जो हमने दिल मे छिपा रक्खी है।
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तेरी बातों को भुलाना नहीं आता हमको,
तेरी खुशबू जो अब लब़्जों मे बसा रक्खी है।
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यूं ही नही आया हमें हुनर मोहब्बत वाला,
तेरी वफा ए चाह जो खयालों मे बसा रक्खी है।
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कैसे तिरे बिन कहें खुद को मुकम्मल 'अनुज',
तुम मेरी हो ये जो दुनियाँ को बता रक्खी है।
-- अनुज कुमार गौतम 'अश्क'
सतना मध्यप्रदेश
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