मुखडा सौंदर्य से दमक रहो।
छवि आंखन अतिशय भाय रही।
छाई नभ मे घनघोर घटा।
उर बगिया साँझ सुहाय रही।
उर में व्यापत है काम कला।
रति देख दशा बहकाय रही।
जब सेज चढे सजना सजनी।
सखि देखि देखि मुस्काय रही।
कछु कहत बनय नहीं बात सही।
सखि आय रही सखि जाय रही।
कब अइहैं अब सजना मोरे।
सखि सोच सोच भरमाय रही।
उर उपवन बाग निहार रही,
व्याकुल मति नीर बहाय रही।
प्रिय नेह को नैना तरस रहे।
सखि मंद मंद मुसकाय रही।
-- अनुज कुमार गौतम अश्क
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